हदिये की तहक़ीक़ का कैसा जज़्बा
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     हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज रहमतुल्लाहि अलयहि को कौन नहीं जानता ?  आप सल्तनते बनू उमय्या के मशहूर खलीफा गुज़रे है । आप बादशाह थे । लेकिन उंचे  दरजे के तकवेवाले थे ।

    आपकी परहेजगारी बेमिसाल थी । एक दिन की बात है । खलीफा हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्लाहि अलयहि बैठे हुए थे ।इतने में एक आदमी आया और आपके सामने दो टोकरियाँ खजूर की पेश की । आपने पूछा . . . " यह खजूरे कहाँ से लेकर आये हो ?

     " उसने कहा . . . “ या अमीरुल मुअमिनीन ! यह ' उर्दून ' के गवर्नर ने आपके लिये हदिये में भेजी है । "  उर्दून एक देश का नाम है । जो आज ' जोर्डन ' नाम से जाना जाता है । फिर आपने उस से पूछा . . . . " इसे वहाँ से लेकर कौन आया है ?

     " उसने कहा . . . “ या अमीरुल मुअमिनीन ! इसे डाक  या ' नी टपाल की सवारियों पर लाद कर लाया गया है । " आप ने पूछा . . . " अच्छा यह बताओ वह सवारीयाँ किस की थी ? " उसने कहा . . . " वह तो बयतुलमाल की थी । "

     यह सुनते ही आपने फरमाया . . . " मैं इन खजूरों को नहीं खा सकता । क्यूं कि मैं बयतुलमाल की सवारियोंका मालिक नहीं हूँ । इसलिये उन सवारियों से फायदा उठाना मेरे लिये मुनासिब नहीं है ।

      बयतुलमाल की सवारियों से फायदा उठाने का हक आम लोगों का है ।


      फिर आपने आगे फरमाया . . . " अभी बाज़ार जाओ और इन दोनों टोकरियों को बेच दो । फिर जो कीमत आए उससे चारा खरीद कर बयतुलमालकी सवारियों को खिला दो । " वह आदमी तुरन्त बाजार गया और चौदह दिरहम में टोकरियों को बेच दिया । 

      टोकरियाँ खरीदने वाला आदमी हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज का भतीजा ही था । । भतीजे ने फिर से एक टोकरी अपने चचा या ' नी हज़रत  उमर बिन अब्दुल अजीज के पास भेजी ।

      हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज़ टोकरी को पहचान गए और उस से पूछा . . .

      " अरे ! क्या यह वहीं टोकरी नहीं है जो तुम उस से पहले मेरे पास लेकर आए थे ? " उस आदमीने कहा . . . " हाँ , वहीं है ।

     लेकिन वह दोनों  टोकरियां आपके भतीजे ने खरीद ली और उस में से एक आपको हदिये में भेजी है । " आपने फरमाया . . . " अब मैं इस को खा सकता हूँ । ”

हदिये की तहकीक का कैसा जजबा ।

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