inspirational short stories about life
अनथक मेहनत की,और इल्म की दौलत ली।

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             एक थे नेक आदमी । उनको बड़ी उम्र में इल्म हासिल से नीश करने का शौक पैदा हुआ । उसवक्त बगदाद इल्मेदीन का मरकज़ था । वहाँ इल्मेदीन के बड़े बड़े उलमा - ए - किराम मौजूद थे ।

           जगह जगह इल्मी मजलिसें लगती थी । चारों तरफ इल्म का चर्चा था । इल्म का बोलबाला था । इसलिये वह आदमी बगदाद पहुंचे और इल्म हासिल करने में मशगूल हो गए ।

           उन के दिल में इल्म की तड़प बहुत थी । लेकिन उम्र ज़्यादा हो चुकी थी । ज़बान बराबर चलती नहीं थी । जो किसी बात को सही तरीके से बोल नहीं सकते थे । जिस की वजह से बच्चे हंसते ।

          उनका मज़ाक उड़ाते । यह देखकर वह आदमी मायूस हो गए । अब उन्होंने कूऐ में डूबकर मर  जाने का इरादा किया । इसी इरादे से वह कूए के करीब पहंचे । इतने में उन की नज़र कूऐ में तैरते हुऐ  लकड़े के एक सख्त टुकडे पर पड़ी । जो घीस चुका था ।

         उस पर जगह जगह किसी चीज़ के घीसाई के नीशान पड़ गए थे । वह देखकर उस आदमी ने एक औरत को पूछा . . . .

         इस टुकडे पर यह नीशान किस चीज़ के है ? " औरतने कहाँ . . . “ यह नीशान डोल और रस्सी के है । लोग जब पानी भरने के लिये रस्सी बांधकर डोल कूऐ में डालते है तो कई मरतबा वह डोल लकड़े के इस टुकडे से टकराती है , जिस की वजह से इस पर नीशान पड़ चूके है ।

         वह जगह जगह से घीस चुका है । औरत की बात सुनकर उस आदमी ने सोचा . . . " जैसे सख्त टुकड़े पर बार बार किसी चीज़ के टकराने से निशान पड सकते है । तो मेरी तो ज़बान नरम है , सख्त  मेहनत और कोशिश से इस ज़बान से सही बात क्यूं नहीं  निकल सकती , जरुर निकल सकती है ।


           यह सोचकर उस आदमी ने डूबने के इरादा छोड़ दिया । वहाँ से वापस आए और फिर इल्म हासिल करने में लग गए । रात - दिन वह इल्म की तलब में लगे रहे । यहाँ तक के एक वक्त वह आया के उनकी गिनती दुन्या के नामवर उलमा और बुजुर्गों में होने लगी । बाद में उन्होंने फारसी भाषामें किताबें लिखी थी ।

           जो आज भी दुन्याभर के मद्रसों में पढाई जाती है और इज्जत की निगाह से देखी जाती है । जानते हो बड़ी उम्र के बावजूद अनथक मेहनत और कोशिश से इल्म की दौलत हासिल कर के इल्मेदीन के बड़े आलिम बननेवाले वह आदमी कौन थे ?

           और उनकी किताबें कौन सी है ? वह आदमी हज़रत शैख सअदी शीराजी रहमतुल्लाहि अलयहि है । और उन की दो मशहूर किताबें गुलिस्ताँ और बोस्ताँ है । आप का असल नाम शरफुद्दीन है । सअदी आप का तखल्लुस है ।

         आप के अब्बाज़ी शैख अब्दुल्लाह इरान के बादशाह सअद जंगी के नौकर थे । उस बादशाह के ज़माने में ही आपने शे'र शाईरी कहना शुरु कर दी थी ।

          इसलिये ' सअदी ' के तखल्लुस से मशहूर हुए । - आप की पैदाईश हिजरी सन 589 में इरान की राजधानी ' शीराज़  में हुई थी । और वफात हिजरी सन 691 में हुई ।

आपने लगभग 100 साल से ज़्यादा उम्र पाई।


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