तहज्जुद गुजार महान बादशाह,शाहजहाँ ,short islamic stories of shaahjaha,

तहज्जुद गुजार महान बादशाह, शाहजहाँ
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सल्तनते मुगल में एक एसे बादशाह गुज़रे है !

         जिन का ज़माना हिन्दुस्तान के इतिहास में ' सुनहरा दौर ' कहा जाता है । जानते हो वह बादशाह कौन थे ? वह बादशाह शाहजहाँ थे । बादशाह शाहजहाँ को तामीरी काम का बहुत शौक था ।

       उन्होंने हिन्दुस्तान में जैसी कई शानदार इमारतें बनवाई जिस की वजह से आज पूरी दुन्या हिन्दुस्तान को जानती है । उन्ही में से एक इमारत है दिल्ही की जामे मस्जिद ।

        इस जामे मस्जिद की संगे बुन्याद किस ने रख्खी । या ' नी उस की पाया विधि किस ने की उस का इतिहास बहुत दिलचस्प है । एक मरतबा बादशाह शाहजहाँने में एक आलीशान मस्जिद बनाने का - इरादा किया!

       लेकिन उनकी चाहत थी के मस्जिद की संगे बुन्याद कोई जैसा आदमी रख्खे जिस की कभी तहज्जुद की नमाज़ न छूटी हो ।

      एक दिन इस के लिये उन्होंने आम लोगों के सिवा उस वक्त के बड़े बड़े उलमा - ए - किराम और बुजुर्गाने दीन को बुलाया । जब सब हाज़िर हो गए तो ओलान किया गया . . . . “ मस्जिद की संगे बुन्याद वह आदमी रख्खे जिसकी कभी तहज्जुद की नमाज़ छूटी न हो ।

 " यह एलान सुनते ही मजलिस में सन्नाटा छा गया। एक दूसरे का मुंह देखने लगे ।

      थोड़ी देर के बाद सादा लिबास पहने हुए एक आदमी आगे बढ़ा । और मस्जिद की संगे बुन्याद रखी । फिर यह आदमी जैसे ही लोगों की तरफ मुड़ा तो सब लोग हैरत में पड़ गए । सबकी आँखे फटी की फटी रह गई । क्यूं कि मस्जिद की संगे बुन्याद रखनेवाले वह आदमी कोई और नहीं लेकिन खूद बाहशाह शाहजहाँ थे ।

        बादशाह शाहजहाँ का असल नाम शिहाबुद्दीन मुहम्मद है । और उन के अब्बाजी का नाम सलीम नुरुद्दीन मुहम्मद था । है । जो जहाँगीर के लकब से मशहूर है ।

        और शाहजहाँ से पहले वही हिन्दुस्तान के बादशाह थे । शाहजहाँ की पैदाइश लाहोर के खुर्रम गाँव में हिजरी सन १००० में हुई थी । जब वह चार साल , चार महिने और चार दिन के हुए तो उन को खानदानी रिवाज के मुताबिक इल्मे दीन हासिल करने के लिये बिठाया गया ।

         उन की तअलीम के लिये उस वक्त के बड़े और काबिल उस्ताद रख्वे गए । उन के उस्तादों में गुजरात के मशहूर बुजुर्ग हजरत शाह वजीहुद्दीन अल्वी गुजराती रहमतुल्लाहि अलयहि का भी नाम आता है । शाहजहाँ ने अपनी हुकूमत में बहुत सी खुबसुरत इमारतें बनवाई ।

       उन्होंने अपनी बेगम मुमताज की याद में ताजमहल बनवाया । जो आज पूरी दुन्या में ' मुहब्बत की नीशानी ' के नाम से जाना जाता है । दिल्ही का लाल किला भी शाहजहाँ ने बनवाया ।

जिस पर राष्ट्रीय पर्व के दिन हमारे हिन्दुस्तान देश का तिरंगा लहराया जाता है।

शाहजहाँ की वफात हिजरी सन 1067 में हुई थी।शाहजहा का मजार आगरा के किले में है।


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