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inspirational stories of success
शहर के काज़ी ने की इयादत,यह तो थी इल्मे दिन की बरकत।
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             बगदाद का नाम तो आपने सुना होगा । वहाँ एक छोटा सा परिवार रहता था । उस में बशीर नाम का एक आदमी था । वह भठियारा था । खाना पकाना उस का काम था।

              उस का एक छोटा लडका था । जिस का नाम हशीम था । बशीर अपने बेटे हशीम को भी अपनी ही तरह भठियारा बनाना चाहता था । इस लिये जैसे ही हशीम बड़ा और समज़दार हुआ तो बशीर उस को रोज़ाना अपने साथ काम पर ले जाने लगा ।

 लेकिन हशीम को भठियारा बनना बिलकुल पसंद नहीं था ।

            वह तो इल्मे दीन हासिल करना चाहता था । और बहुत बड़ा  आलिम बन कर दीने इस्लाम की खिदमत करना चाहता था । लेकिन बशीर अपने बेटे हशीम की इस चाहत से खुश नहीं था । इस  लिये के इल्म कौन सी दौलत है ? और आलिमे दीन का क्या मरतबा है ?

            उस से बशीर बेखबर था । ज़ाहिल था । एक दिन हशीम को एक बड़े आलिमे दीन का पता चला । जो बगदाद के बडे काज़ी भी थे । जिन का दर्स पूरे बगदाद में मशहूर था । सारे बगदाद में उन के इल्म का डंका बजता था । उन का नाम काज़ी अबू शयबह था ।

           हशीम पाबंदी से उन के दर्स में जाने लगा और बड़ी मेहनत से इल्मे दीन हासिल करने लगा । जो बच्चा पढने में पाबंदी करता है और मेहनत भी करता है तो वह उस्ताद की नज़रो में आ ही जाता है ।

         उस्ताद का चहीता बन ही जाता है । हशीम के साथ भी उन के उस्ताद काज़ी अबू शयबह  का एसा ही मामला हुआ।

         एक दिन काजी अबू शयबह दर्स दे रहे थे । बच्चों को सबक पढा रहे थे । उस दिन उन्होंने हशीम को गेरहाजिर पाया । दर्स पूरा होने के बाद बच्चों से उन्हों ने पूछा . . . हशीम कहाँ है ? वह क्यों नजर नहीं आता ? जवाब मिला . . . " वह आज बीमार है ।

          काज़ी साहब ने कहाँ . . . " अच्छा । हशीम बीमार है। तो हमें उस की इयादत के लिये जाना चाहिए । उस की बीमार पुरसी करना चाहिए । " यह सुन कर सभी शार्गिद काज़ी साहब के साथ गये । और बीमार पुरसी के लिये हशीम के घर के दरवाजे पर पहुंचे ।

        उस वक्त हशीम के अब्बा बशीर भी घर में मौजूद थे । वह तो काज़ी साहब को देखकर ही हैरान रह गये । एकदम चौंक गये के बगदाद के काज़ी साहब और मेरे घर पर?

      वह फौरन खडे हुए और अदब से बोले . . . ! " काज़ी साहब ! कहिए , कैसे आना हुआ ? " काज़ी साहबने फरमाया . . . " हम हशीम की बीमार पुरसी के लिये आये है । काज़ी अबू शयबह कुछ देर बाद हशीम की इयादत करके चले गये ।

       उन के जाने के बाद बशीरने बेटे हशीम को कहाँ . . . " बेटा ! अब तुम शौक से इल्मे दीन हासिल करो ।अब मैं तुमको इस से नहीं रोकुंगा । आज पता चला के इल्मे दीन कौन सी दौलत है ।

       यह इल्मे दीन की तो बरकत है के बगदाद के इतने बडे काज़ी मेरे घर पर आये | मुजे तो उसकी उम्मीद भी नहीं थी ।  इल्मे दीन की कैसी बरकत ! कैसी अज़मत !

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